Etawah Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश का इटावा जिला चुनावी लिहाज से सैफई पट्टी का अहम इलाका माना जाता है. 2017 और 2022 के विधानसभा नतीजों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर साफ है. 2017 में भाजपा ने इटावा सदर, जसवंतनगर और भरथना तीनों सीटें जीती थीं. 2022 में तस्वीर पलटी और सपा ने जसवंतनगर तथा भरथना अपने नाम कर लीं, जबकि इटावा सदर भाजपा के पास रहा. यानी पांच साल में जिले का मुकाबला एकतरफा नहीं, बल्कि सीट-दर-सीट बदलता दिखा है. यही आंकड़ा 2027 की चर्चा को दिलचस्प बनाता है.
इटावा सदर में 2022 का मुकाबला कांटे का रहा. भाजपा की सरिता भदौरिया को 98,150 वोट मिले, जबकि सपा के सर्वेश शाक्य को 94,166 वोट मिले. जीत का अंतर सिर्फ 3,984 वोट रहा. 2017 में सरिता भदौरिया ने 91,234 वोट लेकर सपा के कुलदीप गुप्ता को 17,342 वोट से हराया था. पांच साल में भाजपा की बढ़त काफी सिकुड़ी. सपा का वोट शेयर भी 33.44 प्रतिशत से बढ़कर 38.35 प्रतिशत हुआ. यही वजह है कि सदर सीट को 2027 में सबसे कड़ा मुकाबला माना जा रहा है.
सदर में मुकाबला क्यों कड़ा
इटावा सदर सामान्य सीट है और शहर के साथ अर्द्ध-शहरी इलाकों का मेल यहां चुनावी गणित बनाता है. स्थानीय राजनीतिक आकलनों में राजपूत और लोधी मतदाताओं की अच्छी मौजूदगी बताई जाती है, जबकि ब्राह्मण, वैश्य, मुस्लिम, दलित और दूसरे पिछड़े वर्ग भी नतीजे पर असर डालते हैं. 2022 के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा और सपा के बीच अंतर कम रह गया था. इसलिए 2027 में सिर्फ पुराने गढ़ या जातीय समीकरण के भरोसे नतीजा तय मानना ठीक नहीं होगा. उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, संगठन और मतदान प्रतिशत भी निर्णायक रहेंगे.

जसवंतनगर में सपा का गढ़
जसवंतनगर की कहानी बाकी दोनों सीटों से अलग है. 2017 में शिवपाल सिंह यादव ने सपा के टिकट पर 1,26,834 वोट पाए और भाजपा के मनीष यादव पत्रे को 52,616 वोट से हराया. 2022 में शिवपाल यादव को 1,59,718 वोट मिले और भाजपा के विवेक शाक्य को 68,739 वोट मिले. जीत का अंतर बढ़कर 90,979 हो गया. वोट शेयर भी 54.42 प्रतिशत से बढ़कर 62.97 प्रतिशत पहुंचा. पांच साल के आंकड़ों से साफ है कि जसवंतनगर में सपा की पकड़ कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत हुई.
यादव समीकरण क्यों भारी
जसवंतनगर को सपा का मजबूत गढ़ कहने के पीछे सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि लंबे समय का राजनीतिक इतिहास भी है. इस इलाके में यादव मतदाताओं का प्रभाव माना जाता है और शाक्य, पाल, अन्य पिछड़े वर्ग, दलित तथा सवर्ण मतदाता भी चुनावी समीकरण का हिस्सा हैं. स्थानीय बातचीत में यादव वोट को यहां असरदार माना जाता है, लेकिन चुनाव सिर्फ एक जाति से नहीं जीता जाता. 2022 में शिवपाल यादव की 62.97 प्रतिशत हिस्सेदारी बताती है कि सपा को व्यापक समर्थन मिला. 2027 में उम्मीदवार और मुद्दे अहम होंगे.
भरथना में सपा का उलटफेर
भरथना अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित विधानसभा सीट है और 2017 से 2022 के बीच यहां बड़ा बदलाव दिखा. 2017 में भाजपा की सावित्री कठेरिया को 82,005 वोट मिले और सपा के कमलेश कुमार कठेरिया को 80,037 वोट मिले. जीत का अंतर 1,968 वोट था. 2022 में सपा के राघवेंद्र कुमार सिंह को 1,03,676 वोट मिले, जबकि भाजपा के सिद्धार्थ शंकर दोहरे को 96,117 वोट मिले. सपा ने 7,559 वोट से जीत दर्ज की. मुकाबला नजदीकी से सपा के पक्ष में चला गया और भाजपा की पुरानी बढ़त खत्म हुई.
SC-OBC समीकरण पर नजर
भरथना में दलित मतदाता चुनावी तस्वीर का बड़ा हिस्सा हैं, क्योंकि यह सीट आरक्षित है. स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में जाटव और कठेरिया समुदायों के साथ शाक्य, कुशवाह और यादव जैसे पिछड़े वर्गों की भूमिका भी बताई जाती है. हालांकि जातिवार मतदाताओं की संख्या निर्वाचन आयोग के इन नतीजों में उपलब्ध नहीं है, इसलिए किसी समुदाय की संख्या को पक्के आंकड़े की तरह नहीं देखना चाहिए. 2022 में सपा उम्मीदवार को 42.02 प्रतिशत और भाजपा उम्मीदवार को 38.96 प्रतिशत वोट मिले. यही अंतर बताता है कि सामाजिक समीकरण यहां अहम हैं.
2027 में सदर बड़ा सवाल
अगर 2017 और 2022 के आंकड़ों को आधार बनाएं तो 2027 में इटावा सदर सबसे ज्यादा चर्चा वाली सीट बनती है. भाजपा ने दोनों चुनाव जीते, लेकिन जीत का अंतर 17,342 से घटकर 3,984 वोट रह गया. दूसरी तरफ सपा का वोट शेयर 33.44 से बढ़कर 38.35 प्रतिशत पहुंचा. यह बदलाव बताता है कि सीट पर मुकाबला कड़ा हुआ है. भाजपा के पास मौजूदा बढ़त और संगठन का आधार है, जबकि सपा पिछली बढ़त को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगी. अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों से बनेगी, इसलिए अभी पक्का विजेता कहना जल्दबाजी होगी.
सैफई पट्टी में सपा असर
इटावा को समझने के लिए सैफई और आसपास की राजनीति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जसवंतनगर में सपा की लगातार मजबूत जीत और भरथना में 2022 की वापसी उसके क्षेत्रीय संगठन और सामाजिक आधार की ओर इशारा करती है. लेकिन जिले को पूरी तरह सपा का कहना भी सही नहीं होगा, क्योंकि इटावा सदर में भाजपा लगातार दो बार जीत चुकी है. इसलिए 2027 की तस्वीर में एक तरफ सपा का ग्रामीण और क्षेत्रीय प्रभाव है, तो दूसरी तरफ सदर में भाजपा की मौजूदगी. असली लड़ाई बूथ स्तर के संगठन पर निर्भर करेगी.
2027 का आंकड़ों पर अनुमान
मौजूदा आंकड़ों से इतना कहा जा सकता है कि जसवंतनगर में सपा की स्थिति सबसे मजबूत दिखाई देती है, भरथना में भी सपा को बढ़त मिली है, जबकि इटावा सदर में भाजपा आगे है लेकिन अंतर बहुत कम है. इसलिए पूरे जिले में सपा के पलड़े को भारी कहना एक चुनावी अनुमान है, पक्का नतीजा नहीं. 2027 में टिकट, उम्मीदवार की छवि, स्थानीय समस्याएं, सरकार के काम, विपक्ष की रणनीति और मतदान प्रतिशत समीकरण बदल सकते हैं. चुनाव आयोग की घोषणा और नतीजे आने तक हर आकलन अनुमान समझना चाहिए.





