उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर ऐसा मामला सामने आया है, जिसने नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं. खोजी पत्रकारिता संस्थान द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मौजूद 4.3 लाख से ज्यादा फॉर्म-7 का विश्लेषण किया. रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों की ओर से दर्ज 87,127 अनुरोधों में से 85,854 में नाम हटाने की स्पष्ट वजह नहीं लिखी थी. रिपोर्ट में इसे करीब 98.5 प्रतिशत बताया गया है. दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने आरोपों को भ्रामक बताते हुए प्रक्रिया को कानून के मुताबिक बताया है.
मामले की जड़ समझने के लिए फॉर्म-7 की भूमिका जानना जरूरी है. किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए इस फॉर्म का इस्तेमाल किया जाता है. खोजी रिपोर्ट के अनुसार, SIR की सुनवाई के दौरान जब अधिकारियों ने कुछ मतदाताओं को अपात्र माना, तो ERONET सॉफ्टवेयर से उनके नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 अपने आप तैयार हुए. रिपोर्ट में चार चुनाव अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि इन फॉर्म पर अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर भी मौजूद थे. मुख्य निर्वाचन अधिकारी का कहना है कि अधिकारियों ने खुद संज्ञान लेकर जांच की, नोटिस जारी किए और सुनवाई के बाद फैसला लिया. उनके मुताबिक, फॉर्म-7 रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के लिए जनरेट किए गए थे.
फॉर्म-7 की प्रक्रिया पर सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर नाम हटाने की वजह रिकॉर्ड में सुरक्षित रखने के लिए फॉर्म-7 तैयार किए गए, तो रिपोर्ट में बताए गए 85,854 फॉर्म में स्पष्ट कारण क्यों नहीं मिला? निर्वाचन कार्यालय की सफाई के मुताबिक, 6 जनवरी 2026 को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची में करीब 3.26 करोड़ मतदाताओं को नो-मैपिंग और तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस दिए गए थे. कार्यालय ने कहा कि सुनवाई के बाद अधिकारियों ने पात्रता पर फैसला लिया और अपात्र पाए गए लोगों के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं किए जाने थे. ऐसे में विवाद का केंद्र यह है कि संबंधित आदेशों में कारण दर्ज हैं या नहीं और उनकी जांच कैसे हो सकती है.
समयसीमा-आवेदनों का विवाद
रिपोर्ट में समयसीमा को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. उसके मुताबिक, व्यक्तिगत आवेदकों के 1,10,476 नाम हटाने के अनुरोध तय समयसीमा के बाद स्वीकार किए गए. वहीं अधिकारियों से जुड़े 87,127 अनुरोध 15 मार्च से 2 अप्रैल 2026 के बीच दर्ज होने की बात कही गई है. मुख्य निर्वाचन अधिकारी का पक्ष है कि आवेदन जमा करने की आखिरी तारीख और पहले से चल रहे मामलों की सुनवाई तथा निपटारे की समयसीमा अलग-अलग होती है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 198 मामलों में एक व्यक्ति के नाम से 10 से ज्यादा फॉर्म-7 दाखिल हुए और कुल 4,740 मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश हुई. इन आंकड़ों पर दोनों पक्षों की व्याख्या अलग है.
मुस्लिम मतदाताओं को लेकर आरोप
रिपोर्ट में तरबगंज और पीलीभीत विधानसभा क्षेत्रों का भी जिक्र है. दावा किया गया कि वहां फॉर्म-7 के जरिए नाम हटाने के अनुरोधों में करीब 90 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं से जुड़े थे. तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से एक ही दिन, एक ही बूथ के 188 मतदाताओं के खिलाफ आपत्तियां दर्ज होने की बात कही गई. मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि रिपोर्ट में बताए गए दोनों विधानसभा क्षेत्रों के संबंधित फॉर्म-7 निरस्त कर दिए गए थे. उन्होंने रिपोर्ट तैयार करने वाले पत्रकारों के सवाल भेजने और जवाब के लिए दिए गए समय पर भी आपत्ति जताई. अब इस विवाद में अहम सवाल यही हैं कि फॉर्म में कारणों का रिकॉर्ड, संबंधित आदेश और आवेदनों की जांच कितनी पारदर्शी है.
(रिपोर्ट: रोहित शर्मा, गाजियाबाद)






