Sonam Wangchuk Hunger Strike: यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा में कथित धांधली के खिलाफ विरोध नहीं है, बल्कि देश के लाखों छात्रों की उस बेचैनी की कहानी है, जो वर्षों की मेहनत के बाद भी अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. दिल्ली का जंतर-मंतर पिछले कुछ हफ्तों से उसी बेचैनी, गुस्से और उम्मीद का केंद्र बना हुआ है. यहां छात्र, अभिभावक, बेरोजगार युवा और सामाजिक कार्यकर्ता एक ऐसे सवाल के साथ जुटे हैं, जो आज देश के हर घर में पूछा जा रहा है—अगर प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो जाएं, तो मेहनत करने वाले युवाओं का क्या होगा? इसी सवाल ने एक ऐसे आंदोलन को जन्म दिया, जिसने सोशल मीडिया से निकलकर देश की राजनीति और सत्ता के गलियारों तक दस्तक दे दी है.
इस पूरी कहानी की शुरुआत NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक के आरोपों से हुई. लाखों छात्रों ने दावा किया कि परीक्षा प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर छात्रों का गुस्सा दिखाई देने लगा. पोस्ट, वीडियो, लाइव सेशन और ऑनलाइन कैंपेन के जरिए यह मुद्दा देशभर में फैल गया. लेकिन आंदोलन को असली पहचान तब मिली, जब “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम सामने आया. पहली नजर में यह नाम किसी मजाक या मीम जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपी सोच ने हजारों युवाओं को एक मंच पर ला खड़ा किया.
कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं है. यह एक व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक आंदोलन है. आंदोलन से जुड़े युवाओं का कहना है कि जब उन्हें अपमानित करने के लिए “कॉकरोच” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया, तो उन्होंने उसी शब्द को अपनी ताकत बना लिया. उनका तर्क है कि कॉकरोच ऐसा जीव है जो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी जिंदा रहता है. उसे बार-बार खत्म करने की कोशिश की जाए, फिर भी वह लौट आता है. यही वजह है कि छात्रों ने कॉकरोच को अपने संघर्ष, जिद और हौसले का प्रतीक बना लिया. जल्द ही सोशल मीडिया पर कॉकरोच मास्क और पोस्टर वायरल होने लगे और फिर यह प्रतीक जंतर-मंतर तक पहुंच गया.
इस आंदोलन को आकार देने वाले प्रमुख चेहरों में अभिजीत दीपके का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है. अमेरिका के बोस्टन में रहने वाले अभिजीत ने सोशल मीडिया के जरिए इस अभियान को शुरू किया था. शुरुआत में यह एक डिजिटल व्यंग्य था, लेकिन देखते ही देखते हजारों छात्र इससे जुड़ गए. अभिजीत लगातार लाइव सेशन, ऑनलाइन कैंपेन और जनसंपर्क के जरिए इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाते रहे. जब आंदोलन दिल्ली पहुंचा तो वह भी इसकी अगली कतार में दिखाई दिए. आज कॉकरोच जनता पार्टी का नाम लिया जाता है तो अभिजीत दीपके का नाम अपने आप चर्चा में आ जाता है.
हालांकि आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान तब मिली जब लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरणविद और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक इससे जुड़ गए. देश उन्हें शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और लद्दाख के अधिकारों के लिए लंबे संघर्ष के कारण पहले से जानता है. जब उन्होंने छात्रों की बातें सुनीं और जंतर-मंतर पर उनका शांतिपूर्ण प्रदर्शन देखा, तो उन्होंने खुलकर समर्थन देने का फैसला किया. 28 जून को उन्होंने खुद को “मानद कॉकरोच” घोषित करते हुए आमरण अनशन शुरू कर दिया. उनके इस कदम ने पूरे आंदोलन को नई ऊर्जा दे दी. जो आंदोलन अब तक मुख्य रूप से छात्रों तक सीमित था, वह अचानक राष्ट्रीय मीडिया और राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन गया.
दिन बीतते गए और अनशन लंबा होता गया. जंतर-मंतर पर हर दिन छात्रों की भीड़ बढ़ने लगी. कोई अपने सपनों की कहानी सुनाता था, कोई अपने परिवार की उम्मीदों की. कई अभिभावक भी वहां पहुंचे, जिनका कहना था कि बच्चों ने वर्षों तक दिन-रात मेहनत की है और अब वे सिर्फ निष्पक्ष व्यवस्था चाहते हैं. इस दौरान सोनम वांगचुक लगातार छात्रों के बीच बैठे रहे. उनकी उपस्थिति आंदोलन के लिए नैतिक ताकत बन गई थी.
अनशन के करीब बीस दिन बाद स्थिति बदलने लगी. डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि उनकी सेहत तेजी से बिगड़ रही है. वजन कम हो चुका था, शरीर कमजोर पड़ रहा था और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम सामने आ रहे थे. 18 जुलाई की सुबह अचानक दिल्ली पुलिस और प्रशासन की टीम जंतर-मंतर पहुंची. इसके बाद सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया. पुलिस का कहना था कि यह कदम उनकी जान बचाने और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर उठाया गया है. दूसरी ओर आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि उन्हें जबरन हटाया गया. यहीं से आंदोलन ने नया मोड़ ले लिया.
अस्पताल पहुंचने के बाद सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंग्मो आंदोलन का नया चेहरा बनकर सामने आईं. उन्होंने मीडिया के सामने कई सवाल उठाए और कहा कि परिवार को पर्याप्त जानकारी नहीं दी जा रही है. उन्होंने अस्पताल के बाहर खड़े होकर लगातार अपने पति की स्थिति पर जानकारी दी और आंदोलनकारियों का मनोबल बनाए रखा. उनकी भावुक अपीलों और तीखे सवालों ने इस मुद्दे को और ज्यादा चर्चा में ला दिया. कई लोगों ने पहली बार उन्हें देखा, लेकिन कुछ ही घंटों में वह आंदोलन की प्रमुख आवाज बन गईं.
उधर जंतर-मंतर पर आंदोलन रुका नहीं. सोनम वांगचुक के अस्पताल पहुंचने के बाद अभिजीत दीपके ने मंच से घोषणा की कि आंदोलन जारी रहेगा. उन्होंने खुद भूख हड़ताल शुरू कर दी और कहा कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य की है. इस घोषणा के बाद आंदोलनकारियों के बीच नया जोश देखने को मिला. उनका कहना था कि अगर एक चेहरा हटता है तो दूसरा आगे आएगा, लेकिन आंदोलन नहीं रुकेगा.
अब पूरे आंदोलन की नजर 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च पर है. आंदोलनकारी चाहते हैं कि उनकी आवाज सीधे संसद तक पहुंचे. उनका कहना है कि यह सिर्फ NEET का मामला नहीं है, बल्कि देश की परीक्षा व्यवस्था, युवाओं के भविष्य और जवाबदेही का सवाल है. दूसरी तरफ सुरक्षा एजेंसियां और प्रशासन भी पूरी तरह सतर्क हैं, क्योंकि संसद का सत्र चल रहा है और बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की संभावना है. ऐसे में दिल्ली की सियासत से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह इसी मार्च की चर्चा हो रही है.
दरअसल इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें गुस्से के साथ-साथ प्रतीक और भावनाएं भी हैं. कॉकरोच मास्क सिर्फ एक मास्क नहीं है, बल्कि उन युवाओं की कहानी है जो खुद को व्यवस्था के सामने कमजोर महसूस करने के बावजूद हार मानने को तैयार नहीं हैं. सोनम वांगचुक का अनशन सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि नैतिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. अभिजीत दीपके का अभियान यह दिखाता है कि सोशल मीडिया किस तरह जमीन पर बड़े आंदोलन में बदल सकता है. वहीं गीतांजलि आंग्मो की सक्रियता इस संघर्ष को मानवीय चेहरा देती है.
आने वाले दिनों में अदालत, सरकार, पुलिस और आंदोलनकारियों के कदम तय करेंगे कि यह आंदोलन किस दिशा में जाता है. लेकिन इतना तय है कि जंतर-मंतर पर शुरू हुई यह कहानी अब सिर्फ एक परीक्षा या एक धरने की कहानी नहीं रह गई है. यह देश के युवाओं की उम्मीदों, निराशाओं, संघर्ष और जवाबदेही की मांग की कहानी बन चुकी है. और शायद यही वजह है कि आज पूरा देश इस आंदोलन को सिर्फ देख नहीं रहा, बल्कि उसे समझने की कोशिश भी कर रहा है.
















