रसोई गैस का बड़ा रहस्य देश भर के करोड़ों घरों में रोज़ाना भोजन पकाने के लिए एलपीजी का इस्तेमाल किया जाता है। अक्सर नया सिलेंडर आने पर जब लोग उसे हिलाकर देखते हैं, तो अंदर किसी तरल पदार्थ के हिलने की आवाज़ आती है। इसे देखकर आम लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या इसमें गैस की जगह कोई तरल या पानी भरा हुआ है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह कोई पानी नहीं, बल्कि वही रसोई गैस होती है जो एक विशेष भौतिक अवस्था में अंदर मौजूद रहती है। इसे इस तरह डिज़ाइन किया जाता है ताकि सुरक्षा और ईंधन की मात्रा दोनों बनी रहें।
सिलेंडर में गैस बनती है तरल इस प्रक्रिया को समझने के लिए हमें पदार्थ के व्यवहार को जानना होगा। एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन गैसों का मिश्रण होती है। सामान्य तापमान और दबाव में ये दोनों गैस अवस्था में ही पाई जाती हैं। लेकिन जब इन गैसों को लोहे के मजबूत सिलेंडर में भारी दबाव के साथ डाला जाता है, तो इनके अणु एक-दूसरे के बेहद करीब आ जाते हैं। अत्यधिक कंप्रेस (Compress) होने की वजह से गैस अपना रूप बदलकर तरल यानी लिक्विड बन जाती है। इसी कारण सिलेंडर हिलाने पर पानी जैसी अनुभूति होती है।
रेगुलेटर ऑन करते ही क्या होता है? जब हम खाना बनाने के लिए सिलेंडर में लगे रेगुलेटर का नॉब चालू करते हैं, तो अंदर दबा हुआ तरल तुरंत बाहर निकलने की कोशिश करता है। जैसे ही यह तरल सिलेंडर के वॉल्व से बाहर निकलता है, इस पर पड़ा उच्च दबाव एकदम से घट जाता है। दबाव कम होते ही यह तरल पदार्थ वापस गैस के रूप में बदल जाता है और बर्नर तक पहुँचकर नीली लौ के साथ जलने लगता है। यानी सिलेंडर के अंदर यह भले ही पानी जैसा तरल रहे, लेकिन बर्नर तक पहुँचते-पूँछते यह पूरी तरह शुद्ध गैस बन चुका होता है।
तरल रूप में रखने का फायदा गैस को तरल रूप में बदलने के पीछे एक बहुत बड़ा व्यावहारिक और तकनीकी कारण है। यदि गैस को उसकी सामान्य अवस्था में ही सिलेंडर में भरा जाए, तो एक बड़े सिलेंडर में बहुत कम मात्रा में ईंधन आएगा। लेकिन जब इसे अत्यधिक दबाव देकर तरल बनाया जाता है, तो कम जगह में कई सौ गुना अधिक गैस समा जाती है। उदाहरण के लिए, 1 किलोग्राम तरल एलपीजी जब गैस में बदलती है तो वह बहुत बड़े क्षेत्र को कवर कर सकती है। इसी वजह से एक 14.2 किग्रा का घरेलू सिलेंडर हफ्तों तक आसानी से चलता है।
उपभोक्ताओं पर प्रभाव और वैज्ञानिक समझ इस वैज्ञानिक जानकारी के बाद उपभोक्ताओं के मन में सिलेंडर में पानी होने का भ्रम पूरी तरह दूर हो जाना चाहिए। यह तकनीक न केवल ईंधन को सुरक्षित तरीके से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में मदद करती है, बल्कि परिवहन की लागत को भी बहुत कम कर देती है। यदि यह तकनीक न होती तो हमें रसोई गैस के लिए बहुत बड़े-बड़े टैंकर्स की आवश्यकता होती। इसलिए, जब भी आप सिलेंडर हिलाएं और पानी जैसी आवाज़ सुनें, तो समझ जाएं कि यह विज्ञान का एक शानदार चमत्कार है जो आपके रसोईघर को सुचारू रूप से चला रहा है।










