Auraiya Chunav 2027: औरैया जिले की राजनीति को समझने के लिए तीन विधानसभा सीटों को साथ देखना जरूरी है. जिले में औरैया सदर सुरक्षित, दिबियापुर सामान्य और बिधूना सामान्य सीट है. जिला प्रशासन भी इन तीनों को विधानसभा क्षेत्र के रूप में दर्ज करता है. 2022 के बाद तस्वीर साफ है. औरैया में बीजेपी, जबकि दिबियापुर और बिधूना में सपा के विधायक हैं. यानी जिले का राजनीतिक नक्शा एकतरफा नहीं है. 2027 की लड़ाई में भाजपा अपनी दो सीटों वाली पुरानी पकड़ और सपा अपनी मौजूदा दो सीटों को बचाने की कोशिश करेगी. गांव, कस्बा, जातीय समीकरण, रोजगार और स्थानीय विकास, सबका असर साथ दिखेगा. यही सबसे बड़ा स्थानीय सवाल रहेगा.
औरैया सदर अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट है. आंकड़ों के मुताबिक, कुल मतदाता करीब 3.25 से 3.56 लाख के बीच माने जाते हैं. जाटव और दोहरे मतदाता करीब 66 से 72 हजार बताए जाते हैं. ब्राह्मण 37 से 55 हजार, क्षत्रिय 25 से 30 हजार, मुस्लिम 20 से 27 हजार, लोधी करीब 23 हजार, यादव करीब 16 हजार और पाल-निषाद करीब 10 से 14 हजार बताए जाते हैं. इन आंकड़ों को आधिकारिक जातिवार जनगणना नहीं मानना चाहिए, बल्कि स्थानीय राजनीतिक आकलन समझना चाहिए. सुरक्षित सीट होने के बावजूद यहां गैर-दलित वोटों की गोलबंदी भी उम्मीदवार की जीत का फासला तय करती है. यही संतुलन चुनाव को दिलचस्प बनाता है.

भाजपा की पकड़ यहां मजबूत
औरैया सदर में भाजपा की पकड़ पिछले दो विधानसभा चुनावों में साफ दिखी है. 2017 में रमेश चंद्र भाजपा से 83,580 वोट लेकर जीते थे, जबकि बसपा के भीमराव आंबेडकर को 51,718 और सपा के मदन सिंह गौतम को 39,201 वोट मिले. 2022 में भाजपा की गुड़िया कठेरिया ने 88,631 वोट हासिल किए और सपा के जितेंद्र कुमार दोहरे को 66,184 वोट मिले. अंतर 22,447 रहा. बसपा के रवि शास्त्री दोहरे को 36,159 वोट मिले. इस इतिहास से समझ आता है कि बसपा का वोट यहां मुकाबले का समीकरण बदल सकता है, खासकर तब, जब दलित वोटों में विभाजन हो.
दिबियापुर में कांटे की टक्कर
दिबियापुर की कहानी औरैया से अलग है. यहां 2022 में सपा के प्रदीप कुमार यादव ने 80,865 वोट लेकर भाजपा के लखन सिंह राजपूत को 473 वोट से हराया. भाजपा को 80,392 वोट मिले. यह आंकड़ा बताता है कि सीट पर मुकाबला बेहद नजदीकी है और थोड़े से वोटों का खिसकना पूरा परिणाम बदल सकता है. 2017 में तस्वीर उलटी थी. भाजपा के लखन सिंह 71,480 वोट लेकर जीते थे, जबकि सपा के प्रदीप यादव को 59,386 वोट मिले. स्थानीय आकलनों में यादव, पाल, शाक्य, लोधी, ब्राह्मण और ठाकुर मतदाताओं की भूमिका बताई जाती है. हर बूथ यहां अहम है.
दिबियापुर का जातीय गणित
दिबियापुर में करीब 3.23 लाख मतदाताओं का आंकड़ा आपके दिए विवरण में सामने आता है, जबकि 2022 के आधिकारिक चुनाव आंकड़ों में कुल मतदान 2,00,455 रहा था और मतदान प्रतिशत 62.03 था. यहां यादव मतदाता सपा के लिए अहम आधार माने जाते हैं. ब्राह्मण और क्षत्रिय मतदाता भी प्रभाव रखते हैं. पाल, शाक्य और लोधी जैसे ओबीसी समूह तथा जाटव और अन्य दलित मतदाता किसी भी उम्मीदवार की बढ़त रोक या बढ़ा सकते हैं. इसलिए केवल एक जाति के सहारे चुनाव जीतना आसान नहीं है. उम्मीदवार की छवि, संगठन, बूथ प्रबंधन, विकास के काम और स्थानीय नाराजगी भी यहां बहुत मायने रखते हैं. यही यहां की खासियत है.
बिधूना में सपा की जमीन
बिधूना को सपा के पुराने प्रभाव वाले इलाकों में गिना जाता है, लेकिन 2017 ने दिखाया कि भाजपा यहां भी मजबूत चुनौती दे सकती है. उस चुनाव में भाजपा के विनय शाक्य 81,905 वोट लेकर जीते थे. सपा के दिनेश कुमार वर्मा को 77,995 और बसपा के शिव प्रसाद यादव को 53,366 वोट मिले. 2022 में सपा ने वापसी की. रेखा वर्मा को 97,257 वोट मिले और भाजपा की रिया शाक्य को 89,492 वोट. जीत का अंतर 7,765 रहा. यानी यहां मुकाबला जातीय आधार के साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय माहौल से भी तय होता है. यही जमीन का सच है.
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बिधूना में शाक्य यादव असरदार
बिधूना में करीब 3.65 लाख मतदाता होने का आंकड़ा दिया गया है. 2022 के चुनावी रिकॉर्ड में कुल मतदाता 3,65,285 दर्ज हैं. यहां यादव, शाक्य और दूसरे ओबीसी समूहों के साथ पाल, दलित और सवर्ण मतदाता भी चुनावी समीकरण में अहम माने जाते हैं. ब्राह्मण और ठाकुर वोटों की मौजूदगी उम्मीदवारों की रणनीति को प्रभावित करती है. बसपा को भी 2022 में 32,220 वोट मिले, जो दिखाता है कि तीसरे दल का वोट पूरी तरह गायब नहीं है. गांव-गांव की स्थानीय पसंद, परिवार और बिरादरी का प्रभाव, प्रत्याशी की पहुंच तथा क्षेत्र की सड़क, पानी, रोजगार और विकास की बातें चुनाव में असर डाल सकती हैं. यही वोट कई जगह परिणाम बदल सकता है.
बसपा का वोट क्यों महत्वपूर्ण
औरैया की तीनों सीटों में बसपा का असर अब भाजपा-सपा के बीच सीधी लड़ाई के लिए एक अहम सवाल है. 2017 में औरैया सदर पर बसपा को 51,718 वोट मिले थे. 2022 में इसी सीट पर बसपा के रवि शास्त्री दोहरे को 36,159 वोट मिले. दिबियापुर में 2022 में बसपा को 31,500 वोट मिले, जबकि बिधूना में 32,220 वोट मिले. ये वोट जीत के लिए पर्याप्त नहीं रहे, लेकिन मुकाबले का गणित बदलने के लिए जरूर काफी हैं. खासकर औरैया सदर जैसी सुरक्षित सीट पर दलित वोटों का रुख निर्णायक हो सकता है. इसलिए 2027 में बसपा को नजरअंदाज करना दोनों बड़े दलों के लिए जोखिम होगा. यही वजह है कि मुकाबला खुला माना जाएगा.
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2027 के चुनाव के क्या मुद्दे ?
2027 का चुनाव अभी भविष्य की लड़ाई है, इसलिए किसी सीट पर नतीजा पहले से तय मानना ठीक नहीं होगा. फिलहाल आधिकारिक विधानसभा रिकॉर्ड के अनुसार औरैया से गुड़िया कठेरिया भाजपा, दिबियापुर से प्रदीप कुमार यादव सपा और बिधूना से रेखा वर्मा सपा विधायक हैं. 2027 में भाजपा वापसी के लिए संगठन और सामाजिक समीकरण साधेगी, जबकि सपा अपनी दोनों सीटें बचाने पर जोर देगी. लेकिन जमीन पर मुद्दे भी उतने ही जरूरी हैं. जलजमाव जैसी स्थानीय समस्या, रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान और बाजार की हालत मतदाताओं के रोजमर्रा के सवाल हैं. माहौल इन्हीं मुद्दों से बन सकता है.
औरैया में दिलचस्प मुकाबला
पूरे जिले की तस्वीर देखें तो 2027 में मुकाबला तीन अलग कहानियों का होगा. औरैया सदर में भाजपा का मजबूत आधार और सुरक्षित सीट का सामाजिक समीकरण है. दिबियापुर में 473 वोट की जीत बताती है कि भाजपा और सपा के बीच फासला बेहद कम है. बिधूना में सपा की जीत के बावजूद भाजपा सिर्फ 7,765 वोट पीछे रही थी. यानी दोनों दलों के पास वापसी या बढ़त की गुंजाइश है. जातीय गणित यहां जरूरी है, मगर अकेला फैसला नहीं करता. बूथ स्तर का संगठन, प्रत्याशी की छवि, स्थानीय नाराजगी, सरकारी कामकाज और चुनाव के समय बन रहा माहौल अंतिम नतीजे को दिशा देंगे.





