Uttar Pradesh Caste Population: उत्तर प्रदेश को समझना हो तो सिर्फ लखनऊ, प्रयागराज या वाराणसी से काम नहीं चलेगा. गांव-गांव बदलती सामाजिक संरचना यहां की बड़ी पहचान है. सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रदेश में कुल कितनी जातियां हैं, इसका कोई एक आधिकारिक और मौजूदा आंकड़ा सरकार ने जारी नहीं किया है. 1931 की जनगणना, जो जातियों की व्यापक गणना करने वाली आखिरी औपनिवेशिक जनगणना थी, उसमें तत्कालीन संयुक्त प्रांत में 74 हिंदू जातियां दर्ज की गई थीं. लेकिन उस समय उत्तराखंड भी इसी प्रशासनिक इकाई का हिस्सा था. इसलिए उस आंकड़े को आज के उत्तर प्रदेश की कुल जातियों की संख्या मानना सही नहीं होगा.
सरकारी श्रेणियों की बात करें, तो तस्वीर थोड़ी साफ होती है. उत्तर प्रदेश की अधिसूचित OBC सूची में फिलहाल 79 जाति/समुदाय प्रविष्टियां हैं. इसमें यादव, कुर्मी, निषाद-मल्लाह, कोइरी, कुम्हार-प्रजापति, तेली, पाल-बघेल, सैनी-माली, लोधी, नाई, बढ़ई, लोहार, काछी-मौर्य, कश्यप, बिंद, राजभर, चौरसिया, तमोली, धोबी की कुछ श्रेणियां, मुस्लिम पिछड़े समुदायों की कई प्रविष्टियां आदि शामिल हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि 79 का मतलब 79 अलग-अलग सामाजिक समूह ही हों, ऐसा जरूरी नहीं है. सरकारी सूची में कई जगह एक ही प्रविष्टि के भीतर पर्याय, उपजातियां और अलग-अलग नाम शामिल हैं.

OBC की आबादी कितनी है?
यही वह जगह है जहां अक्सर आंकड़े गड़बड़ा जाते हैं. उत्तर प्रदेश में जातिवार आधुनिक जनगणना नहीं हुई है, इसलिए OBC की आबादी का कोई आधिकारिक वर्तमान प्रतिशत उपलब्ध नहीं है. 2021 में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग से जुड़ी खबरों में OBC आबादी करीब 54 प्रतिशत मानी गई थी, लेकिन इसे जनगणना का आधिकारिक आंकड़ा नहीं कहा जा सकता. इसी तरह 39 जातियों को OBC सूची में शामिल करने की प्रक्रिया की खबर भी सामने आई थी, लेकिन प्रस्तावित या विचाराधीन जातियों को मौजूदा सूची में शामिल मान लेना सही नहीं है. यानी 79 वर्तमान अधिसूचित प्रविष्टियां और 39 प्रस्तावित नाम दोनों को मिलाकर संख्या बताना तथ्यात्मक गलती होगी.

SC में कितनी जातियां आती हैं?
चलिए अब अनुसूचित जाति यानी SC की बात करते हैं. केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय विभाग के उपलब्ध रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश के लिए 66 अनुसूचित जातियां अधिसूचित हैं. इनमें चमार/जाटव, पासी, कोरी, धोबी, खटीक, बाल्मीकि, धानुक, मुसहर, डोम, दुसाध, बांसफोर, बेलदार, कंजर, कोल और अन्य समुदाय शामिल हैं. लेकिन यहां भी एक पेच है. कुछ जातियों के नाम सरकारी सूची में जिला-विशेष शर्तों के साथ दर्ज हैं. उदाहरण के लिए गोंड और खरवार जैसे नाम अलग-अलग क्षेत्रों में अलग संवैधानिक श्रेणियों के संदर्भ में दिखाई देते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में SC आबादी 4.13 करोड़ यानी करीब 20.7 प्रतिशत थी.

एसटी की आबादी कितनी है ?
अनुसूचित जनजाति यानी ST की आबादी प्रदेश में काफी कम है, लेकिन इसका क्षेत्रीय महत्व बड़ा है. 2011 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश में ST आबादी करीब 11.34 लाख यानी 0.6 प्रतिशत थी. सरकारी सूची में 15 प्रमुख ST प्रविष्टियां हैं, जिनमें थारू, बुक्सा, भोटिया, जौनसारी, राजी, गोंड समूह, खरवार-खैरवार, सहरिया, परहिया, बैगा, पंखा-पनिका, अगरिया, पटारी, चेरो और भुइया-भुइन्या शामिल हैं. इनमें गोंड समूह की मौजूदगी कई पूर्वी जिलों में है, जबकि सोनभद्र आदिवासी आबादी के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण जिलों में है. इसलिए यूपी की जातीय तस्वीर में ST संख्या छोटी होने के बावजूद पूर्वांचल और विंध्य क्षेत्र में इसका स्थानीय प्रभाव काफी अहम है.

General कोई एक जाति नहीं
अब General यानी सामान्य वर्ग को समझते हैं. General कोई एक जाति नहीं है और न ही इसकी कोई अलग सरकारी ‘जाति सूची’ होती है. आम तौर पर आरक्षण की SC, ST और OBC सूचियों में शामिल न होने वाले समुदायों को सामान्य/अनारक्षित श्रेणी में रखा जाता है. इसमें ब्राह्मण, राजपूत/ठाकुर, वैश्य/बनिया, कायस्थ, भूमिहार, त्यागी जैसे कई समुदाय आते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की वास्तविक आरक्षण श्रेणी उसकी जाति, सरकारी अधिसूचना और लागू नियमों पर निर्भर करती है. इसलिए ‘General में इतनी जातियां’ जैसी निश्चित संख्या बताना सही नहीं होगा. इसी वजह से General को एक जाति समूह समझना भी गलत है, यह मुख्यतः आरक्षण की प्रशासनिक श्रेणी है.
असली जातीय भूगोल समझिए
अब आते हैं असली जातीय भूगोल पर. पश्चिमी यूपी में जाट, गुर्जर, राजपूत, ब्राह्मण, जाटव और विभिन्न OBC समुदायों की मजबूत मौजूदगी दिखाई देती है. मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत और आसपास के इलाकों में जाट समुदाय का सामाजिक प्रभाव लंबे समय से चर्चा में रहा है. आगरा, अलीगढ़ और आसपास जाटव/चमार आबादी भी महत्वपूर्ण है. पश्चिमी यूपी में मुस्लिम आबादी भी कई जिलों में बड़ी है, इसलिए यहां जातीय समीकरण को धर्म और स्थानीय बिरादरी दोनों के संदर्भ में देखना पड़ता है. उपलब्ध ऐतिहासिक और क्षेत्रीय अध्ययनों में भी पश्चिमी यूपी की सामाजिक संरचना को काफी विविध बताया गया है. इसलिए किसी एक जाति को पूरे पश्चिमी यूपी की ‘सबसे बड़ी’ जाति कहना बिना जिलेवार आंकड़ों के ठीक नहीं होगा.
जातीय समीकरण एक जैसा नहीं है
पूर्वांचल और मध्य यूपी की तस्वीर फिर कुछ अलग दिखती है. पूर्वी हिस्से में यादव, कुर्मी, राजभर, निषाद, कोइरी/कुशवाहा, दलित समुदाय और कई अन्य OBC समूहों की मजबूत स्थानीय मौजूदगी है. मिर्जापुर, सोनभद्र, प्रयागराज मंडल के कुछ हिस्सों और आसपास कुर्मी-पटेल समुदाय की अच्छी उपस्थिति बताई जाती है. आजमगढ़, जौनपुर, गाजीपुर, वाराणसी और आसपास यादव तथा अन्य पिछड़े समुदाय राजनीतिक और सामाजिक चर्चा में प्रमुख रहे हैं. वहीं अवध क्षेत्र में ब्राह्मण, राजपूत, कुर्मी, पासी, यादव और कई अन्य समुदायों का मिश्रण है. यही वजह है कि लखनऊ से गोरखपुर और प्रयागराज से बलिया तक जातीय समीकरण एक जैसा नहीं है. हर क्षेत्र की अपनी सामाजिक कहानी है.
‘फलां जाति 12 प्रतिशत, फलां 8 प्रतिशत’
सबसे अहम बात यह है कि यूपी की जातीय तस्वीर को सिर्फ ‘कौन कितने प्रतिशत’ से नहीं समझा जा सकता है. किसी जाति की संख्या, किसी इलाके में उसका स्थानीय प्रभाव, जमीन और खेती से जुड़ी स्थिति, शहरों में कारोबार, शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व ये सभी अलग-अलग चीजें हैं. 2011 की जनगणना SC और ST के लिए भरोसेमंद आधिकारिक आंकड़े देती है, लेकिन OBC और General की पूरी जातिवार आबादी नहीं बताती. इसलिए इंटरनेट पर चलने वाले ‘फलां जाति 12 प्रतिशत, फलां 8 प्रतिशत’ जैसे आंकड़ों को सावधानी से देखना चाहिए. फिलहाल सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि यूपी में जातियों की कुल संख्या का आधिकारिक आधुनिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकारी आरक्षण सूचियां सामाजिक संरचना की एक स्पष्ट तस्वीर जरूर देती हैं.






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