नई दिल्ली: देश के शहरों में कचरा प्रबंधन को वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल दिशा देने के लिए एक बड़ी पहल की गई है। भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार (PSA) प्रो. अजय कुमार सूद ने ‘भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) प्रौद्योगिकियों के लिए एलसीए फ्रेमवर्क का विकास’ परियोजना के समीक्षा सत्र की अध्यक्षता करते हुए एक विशेष जीएचजी (Greenhouse Gas) कैलकुलेटर वेब एप्लिकेशन और लाइफ साइकिल असेसमेंट (LCA) फ्रेमवर्क पेश किया।
यह पहल भारत सरकार के ‘वेस्ट टू वेल्थ मिशन’ और ‘स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन’ की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2024 में शुरू की गई थी। इस परियोजना को भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास और आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी के शोधकर्ताओं के कंसोर्टियम ने मिलकर पूरा किया है।
शहरी निकायों को मिलेगी वैज्ञानिक मदद इस नए डिजिटल प्लेटफॉर्म का मुख्य उद्देश्य देश के शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को कचरा निस्तारण की ऐसी प्रणालियों की योजना बनाने में मदद करना है, जिनसे कम से कम कार्बन उत्सर्जन हो। यह टूल एनारोबिक डाइजेशन, वेस्ट-टू-एनर्जी, कंपोस्टिंग, रीसाइक्लिंग और लैंडफिलिंग जैसी सामान्य प्रक्रियाओं से होने वाले मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और ब्लैक कार्बन जैसे उत्सर्जन का डेटा विश्लेषण करता है।

विभिन्न शहरों के अध्ययन पर आधारित मॉडल परियोजना टीम ने बेंगलुरु, दिल्ली, चेन्नई, मैसूरु, तुमकुरु और वाराणसी जैसे प्रमुख शहरों के व्यावहारिक अध्ययन के आधार पर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए। ऐप में दिए गए ‘सिनारियो कम्पेरिजन मॉड्यूल’ के जरिए निकाय अधिकारी अलग-अलग तकनीकों से होने वाले पर्यावरणीय प्रभावों की तुलना कर सकते हैं और सबसे कम उत्सर्जन वाला विकल्प चुन सकते हैं।
भविष्य की परियोजनाओं में होगी उपयोगिता प्रो. अजय कुमार सूद ने इस बात पर जोर दिया कि यह तकनीक शहरों में कचरा प्रबंधन को स्मार्ट और पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए एक ठोस वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगी। वहीं, वैज्ञानिक सचिव डॉ. परविंदर मैनी ने कहा कि इस टूल का उपयोग नई परियोजनाओं की विस्तृत रिपोर्ट (DPR), निविदाओं के लिए अनिवार्य पर्यावरणीय मानकों और नए टेंडरों के मूल्यांकन में किया जा सकता है।






