लखनऊ में सोमवार दोपहर बीजेपी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए अपने 8 उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए. नाम सामने आते ही पहली नजर में एक बात साफ दिखी कि पार्टी ने इस बार पुराने चेहरों पर भरोसा नहीं किया. सभी 8 उम्मीदवार नए हैं. इनमें दो महिलाएं हैं. सूची में दो ब्राह्मण, एक ठाकुर, तीन पिछड़े और दो दलित चेहरे शामिल हैं. यानी कागज पर यह सिर्फ राज्यसभा की सीटों की सूची नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सामाजिक तस्वीर को साधने वाली सूची नजर आती है.
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. इन 8 नामों को थोड़ा करीब से देखेंगे तो इनके पीछे अलग-अलग इलाकों और समाजों की कहानी दिखाई देती है. कोई लोधी समाज से आता है, कोई कुर्मी और कोई पाल समाज से. दलित वर्ग में खटीक और पासी समाज को जगह मिली है. दो ब्राह्मण चेहरे हैं और एक ठाकुर नेता भी सूची में है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि बीजेपी ने आखिर इन 8 लोगों को ही क्यों चुना और इस फैसले का असली निशाना कहां है.
पहले समझिए चुनाव का गणित
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की कुल 31 सीटें हैं और इनमें 10 सीटों पर 16 अक्टूबर को चुनाव होना है. 6 अक्टूबर नामांकन की आखिरी तारीख है. विधानसभा में इस समय 396 सदस्य हैं, जबकि 7 सीटें विधायकों के निधन के कारण खाली हैं. ऐसे में एक राज्यसभा उम्मीदवार को जीतने के लिए 37 प्रथम वरीयता वोट चाहिए. बीजेपी के पास अपने 255 विधायक हैं. उसके सहयोगी दलों अपना दल, आरएलडी, सुभासपा और निषाद पार्टी के 33 विधायक हैं, जिससे एनडीए के पास 288 विधायक हैं.
आठवीं सीट पर असली पेच
गणित को थोड़ा और खोलें तो बीजेपी के लिए तस्वीर दिलचस्प हो जाती है. पूजा पाल, सपा से निष्कासित 3 विधायक और राजा भैया की जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के 2 विधायकों का समर्थन मिलने पर बीजेपी का प्रभावी आंकड़ा 294 तक पहुंच सकता है. आठ उम्मीदवारों को जिताने के लिए 296 प्रथम वरीयता वोट चाहिए. यानी आठवीं सीट के लिए करीब 2 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ सकती है. यही वजह है कि इस चुनाव में संख्या के साथ-साथ विधायकों की पसंद और क्रॉस वोटिंग भी चर्चा का हिस्सा बन गई है.
सपा के कदम पर निगाह
उधर समाजवादी पार्टी के पास 2 उम्मीदवारों को जिताने के लिए जरूरी संख्या है. अगर पार्टी तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है. ऐसे में 16 अक्टूबर का चुनाव केवल राज्यसभा भेजने की प्रक्रिया नहीं रह जाता. यह बीजेपी और सपा दोनों के लिए विधायकों के बीच अपनी पकड़ परखने का मौका भी है. लेकिन इस चुनाव की असली कहानी वोटों की गिनती से आगे जाती है. बीजेपी ने उम्मीदवारों के नाम जिस तरह चुने हैं, उसमें 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट भी सुनाई देती है.
लोधी चेहरे से पहला संदेश
आंवला से विधायक और योगी सरकार में मंत्री धर्मपाल सिंह इस सूची के अहम नामों में हैं. वह लंबे समय से बीजेपी की राजनीति में सक्रिय हैं और लोधी समाज से आते हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा की प्रोफाइल में उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि लोधी-राजपूत दर्ज है. धर्मपाल सिंह को राज्यसभा भेजकर बीजेपी ने लोधी समाज को सीधा राजनीतिक संदेश दिया है. रुहेलखंड में बरेली और आसपास के इलाके के लिहाज से भी उनका नाम महत्वपूर्ण है. साथ ही सरकार और संगठन दोनों का अनुभव उनके खाते में है.
आंवला सीट की कहानी भी
धर्मपाल सिंह का राज्यसभा जाना सिर्फ दिल्ली की राजनीति तक सीमित नहीं है. उनके राज्यसभा पहुंचने पर आंवला विधानसभा सीट खाली होगी. विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले यह सीट बीजेपी के लिए नया चेहरा तैयार करने का मौका भी बन सकती है. यही वजह है कि धर्मपाल सिंह का चयन दो स्तर पर देखा जा रहा है. एक तरफ लोधी समाज को प्रतिनिधित्व मिलता है, दूसरी तरफ रुहेलखंड में पार्टी को अपनी अगली विधानसभा रणनीति के लिए जगह मिलती है. इस नाम के साथ बीएल वर्मा की जगह भी चर्चा में आई है.
श्रुति से कुर्मी संदेश
इसके बाद नाम आता है श्रुति गंगवार का. वह बीजेपी के वरिष्ठ नेता और झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी हैं. संतोष गंगवार बरेली से 8 बार सांसद रह चुके हैं और कुर्मी समाज के बड़े नेताओं में उनकी पहचान रही है. श्रुति का नाम आते ही बरेली और रुहेलखंड की राजनीति फिर सामने आती है. यहां बीजेपी ने एक तरफ संतोष गंगवार की राजनीतिक विरासत को जगह दी, तो दूसरी तरफ कुर्मी समाज को प्रतिनिधित्व दिया. इसलिए उनका चयन केवल परिवार तक सीमित फैसला नहीं माना जा रहा है.
बरेली से दो संकेत मिले
धर्मपाल सिंह और श्रुति गंगवार के नाम को एक साथ देखें तो बरेली और रुहेलखंड का सामाजिक गणित सामने आता है. एक तरफ लोधी समाज का चेहरा है, दूसरी तरफ कुर्मी समाज का. कुर्मी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण गैर-यादव ओबीसी समूहों में गिने जाते हैं. ऐसे में श्रुति गंगवार का राज्यसभा जाना उस समाज तक पहुंच बनाने का संदेश देता है. खास बात यह भी है कि बीजेपी ने संगठन में कुर्मी नेतृत्व को आगे किया है. इसलिए यह नाम 2027 के लिए पार्टी की सामाजिक तैयारी से जुड़ा दिखाई देता है.
प्रकाश पाल से ओबीसी दांव
प्रकाश पाल का नाम आते ही बीजेपी के पिछड़ा वर्ग मोर्चे की राजनीति सामने आती है. वह बीजेपी के पिछड़ा वर्ग मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं और संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में भी उनकी संगठनात्मक भूमिका रही है. उनका पाल समाज से होना इस चयन को और खास बनाता है. पाल-बघेल समाज उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में मौजूद है. ऐसे में बीजेपी ने एक और गैर-यादव ओबीसी समूह को सीधे प्रतिनिधित्व दिया है. यही इस नाम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है.
सोनकर से दलित संदेश
अब सूची के दलित चेहरों पर नजर डालें तो विद्यासागर सोनकर का नाम सामने आता है. जौनपुर से आने वाले सोनकर बीजेपी के पुराने और अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं. उनका राजनीतिक सफर संगठन से शुरू होकर लोकसभा और विधान परिषद तक पहुंचा है. वह 1996 में लोकसभा सांसद भी रह चुके हैं. उनका चयन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बीजेपी दलित राजनीति में गैर-जाटव सामाजिक समूहों पर अपना फोकस बनाए रखना चाहती है. इस नाम के जरिए पार्टी ने पुराने संगठनात्मक अनुभव और दलित प्रतिनिधित्व, दोनों को साथ रखा है.
प्रियंका रावत से तीन संदेश
प्रियंका सिंह रावत का नाम इस सूची में थोड़ा अलग रंग लेकर आता है. वह पासी समाज से आती हैं और बाराबंकी से 2014 में लोकसभा सांसद रह चुकी हैं. बीजेपी संगठन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है. उनके जरिए पार्टी ने एक साथ तीन संदेश देने की कोशिश की है. पहला दलित प्रतिनिधित्व, दूसरा महिला प्रतिनिधित्व और तीसरा अवध क्षेत्र को राजनीतिक जगह. 2024 में लोकसभा टिकट नहीं मिलने के बाद राज्यसभा का मौका मिलना भी उनके राजनीतिक सफर में अहम पड़ाव है. इससे पुराने संगठनात्मक चेहरों को संदेश जाता है.
दो ब्राह्मण चेहरों का मतलब
सूची में राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय के रूप में दो ब्राह्मण चेहरे हैं. राधाकांत ओझा इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता रहे हैं. उनका नाम राजनीतिक संगठन के साथ कानूनी अनुभव को भी सामने लाता है. दूसरी तरफ गोपी कृष्ण पांडेय लंबे समय से बीजेपी संगठन में सक्रिय रहे हैं और किसान मोर्चा समेत कई जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं. यानी दोनों नाम सिर्फ जातीय प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हैं. एक में कानूनी अनुभव है, दूसरे में लंबे संगठनात्मक काम की पहचान है.
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मोदी से जुड़ी पुरानी याद
गोपी कृष्ण पांडेय का नाम सामने आने के बाद उनकी पुरानी राजनीतिक याद भी चर्चा में आई. करीब 25 साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कानपुर में उनके घर ठहरे थे और दोनों ने साथ में फिल्म भी देखी थी. हालांकि सिर्फ इस पुराने व्यक्तिगत प्रसंग को टिकट का आधार मानना सही नहीं होगा. उनके लंबे संगठनात्मक काम को भी देखना जरूरी है. बीजेपी ने इस बार कई बड़े और चर्चित नामों की जगह संगठन में लंबे समय से काम करने वाले चेहरों को आगे किया है. पांडेय उसी सोच का हिस्सा दिखाई देते हैं.
ठाकुर चेहरे से संतुलन
राम प्रताप सिंह चौहान सूची में ठाकुर या राजपूत प्रतिनिधित्व का चेहरा हैं. वह एत्मादपुर से पूर्व विधायक और बीजेपी के प्रदेश महामंत्री रह चुके हैं. उनका जुड़ाव आगरा और ब्रज क्षेत्र से है. बीजेपी की सूची में सिर्फ एक ठाकुर चेहरा है, इसलिए उनका नाम सवर्ण सामाजिक संतुलन की नजर से भी महत्वपूर्ण हो जाता है. पश्चिमी यूपी और ब्रज क्षेत्र में संगठन का अनुभव उनके चयन की एक बड़ी वजह माना जा रहा है. इस नाम के साथ बीजेपी ने अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को भी संदेश दिया है.
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आठ नामों में पूरा संतुलन
अब पूरी सूची को एक साथ रखिए तो तस्वीर काफी साफ हो जाती है. धर्मपाल सिंह लोधी हैं, प्रकाश पाल पाल समाज से और श्रुति गंगवार कुर्मी समाज से आती हैं. विद्यासागर सोनकर और प्रियंका सिंह रावत दलित समाज से हैं. राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय ब्राह्मण चेहरे हैं, जबकि राम प्रताप सिंह चौहान ठाकुर समाज से आते हैं. दो महिलाएं भी हैं. यानी बीजेपी ने राज्यसभा की सूची में जातीय पहचान के साथ क्षेत्रीय और संगठनात्मक संतुलन साधने की कोशिश की है.
2027 की जमीन पर असली नजर
यहीं से इस पूरी कहानी का बड़ा सिरा जुड़ता है. 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है और बीजेपी के सामने समाजवादी पार्टी का PDA फॉर्मूला है. सपा पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. ऐसे में बीजेपी की सूची में लोधी, कुर्मी और पाल जैसे गैर-यादव ओबीसी समाजों को अलग-अलग प्रतिनिधित्व मिलना महज संयोग नहीं लगता. पार्टी के लिए चुनौती यही है कि जिन सामाजिक समूहों को राज्यसभा में जगह मिली है, उनका भरोसा विधानसभा चुनाव तक भी कैसे बनाए रखा जाए.
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2024 के बाद बदला खेल
2024 के लोकसभा चुनाव ने यूपी की राजनीति में तस्वीर बदल दी. समाजवादी पार्टी ने 37 लोकसभा सीटें जीतकर राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी ताकत दिखाई. इसके बाद बीजेपी के सामने उन सामाजिक समूहों को फिर अपने साथ जोड़ने की चुनौती आई, जिन्होंने पहले उसके चुनावी विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई थी. गैर-यादव ओबीसी और दलितों को लेकर सपा की बढ़ती कोशिशों के बीच बीजेपी ने संगठन और सत्ता में इन वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर रखा. राज्यसभा की यह सूची उसी तैयारी की अगली कड़ी दिखाई देती है.
पुराने चेहरों की जगह बदलाव
अब जरा उन नामों को देखिए जिन्हें इस बार दोबारा मौका नहीं मिला. पीएम मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा का टिकट काट दिया गया. नीरज शेखर, सीमा द्विवेदी, बृजलाल, गीता शाक्य और अरुण सिंह भी दोबारा राज्यसभा नहीं जाएंगे. दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाया गया है. यानी बीजेपी ने पुराने राज्यसभा समूह को लगभग पूरी तरह बदल दिया. संदेश यही है कि इस बार राज्यसभा में पुराने नामों की जगह नए सामाजिक और संगठनात्मक चेहरों को आगे किया गया.
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आखिरी कहानी यहीं खुलती है
इस पूरी सूची को सिर्फ राज्यसभा चुनाव की नजर से देखेंगे तो 8 नाम दिखाई देंगे, लेकिन 2027 की नजर से देखेंगे तो पूरी तस्वीर बदल जाती है. लोधी, कुर्मी और पाल के जरिए गैर-यादव ओबीसी, सोनकर और प्रियंका रावत के जरिए दलित, दो ब्राह्मण और एक ठाकुर के जरिए सवर्ण संतुलन बनाया गया है. साथ ही बरेली, रुहेलखंड, कानपुर-बुंदेलखंड, जौनपुर, बाराबंकी, प्रयागराज और आगरा-ब्रज जैसे इलाकों को भी जगह मिली है. यही वजह है कि बीजेपी की यह सूची राज्यसभा से ज्यादा 2027 की चुनावी जमीन की कहानी सुनाती है. 16 अक्टूबर का चुनाव इस कहानी का पहला पड़ाव होगा.
Source: TV21 Network





