वाराणसी में चुनाव सिर्फ चेहरों और पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द भी घूमता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने सभी 8 सीटों पर जीत दर्ज की थी. लेकिन 2027 में क्या एनडीए अपना पुराना प्रदर्शन दोहरा पाएगा? या जातीय समीकरणों में बदलाव चुनावी तस्वीर बदल देगा? इसका जवाब इन सीटों के जातीय समीकरणों में छिपा है.
वाराणसी की आठों विधानसभा सीटों का सामाजिक समीकरण एक जैसा नहीं है. शहर की सीटों पर व्यापारी, ब्राह्मण, कायस्थ और मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका चर्चा में रहती है, तो ग्रामीण इलाकों में पटेल-कुर्मी, भूमिहार, राजभर, यादव, दलित और अन्य पिछड़े वर्गों का प्रभाव चुनावी मुकाबले को दिलचस्प बनाता है. हालांकि, किसी भी सीट पर जीत का फैसला केवल जाति के आधार पर नहीं होता है. उम्मीदवार की छवि, स्थानीय मुद्दे, पार्टी का संगठन और मतदाताओं का रुझान भी अहम भूमिका निभाते हैं.
वाराणसी में किस समुदाय की कितनी हिस्सेदारी?
TV21 Network के सर्वे के मुताबिक, वाराणसी जिले के जातीय समीकरणों को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते हैं. जिले में दलित समुदाय की हिस्सेदारी करीब 15%, मुस्लिम आबादी 12–13%, भूमिहार 11.8–12%, कुर्मी 10.5%, ब्राह्मण 8.65%, कोइरी-कुशवाहा 8% और यादव 6.95% बताई गई है.
इसके अलावा निषाद समुदाय करीब 5%, राजभर 4.25%, कायस्थ 4%, वैश्य-बनिया 3.25% और राजपूत-क्षत्रिय 2.46% बताए गए हैं. अन्य अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी करीब 13.13% आंकी गई है.
वाराणसी की 8 सीटों पर क्या है जातीय समीकरण?
- वाराणसी उत्तर का जातीय समीकरण
वाराणसी उत्तर सीट पर ब्राह्मण, वैश्य-बनिया, कायस्थ और अन्य शहरी मतदाताओं के साथ मुस्लिम तथा पिछड़े वर्गों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है. घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में स्थानीय सुविधाएं, कारोबार, सड़क, सीवर और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे चुनावी चर्चा को प्रभावित कर सकते हैं.
बीजेपी के रवींद्र जायसवाल ने 2017 और 2022, दोनों विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की. 2027 में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पकड़ बनाए रखने और मतदाताओं के बीच समर्थन बरकरार रखने की होगी.
- वाराणसी दक्षिण विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण
वाराणसी दक्षिण शहर की महत्वपूर्ण सीटों में शामिल है. यहां ब्राह्मण, वैश्य, कायस्थ और मुस्लिम मतदाताओं के साथ दूसरे शहरी समुदायों की भूमिका भी चर्चा में रहती है. धार्मिक और व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े इलाकों में बुनियादी सुविधाएं, भीड़ प्रबंधन, कारोबार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं.
बीजेपी के डॉ. नीलकंठ तिवारी ने 2017 और 2022 में लगातार जीत हासिल की. ऐसे में 2027 में मुकाबला इस बात पर निर्भर करेगा कि बीजेपी अपना समर्थन कितना बनाए रखती है. विपक्ष किस तरह मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करता है.
- वाराणसी कैंट विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण
वाराणसी कैंट में शहरी मध्यम वर्ग, कारोबारी समुदाय, ब्राह्मण, कायस्थ और अन्य सवर्ण मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. इसके साथ दलित और पिछड़े वर्गों के मतदाता भी चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं.
बीजेपी के सौरभ श्रीवास्तव ने 2017 और 2022 में जीत दर्ज की. 2027 में विकास कार्य, शहरी सुविधाएं, महंगाई और स्थानीय जनसमस्याएं चुनावी चर्चा का हिस्सा बन सकती हैं. इस सीट पर उम्मीदवार की छवि और पार्टी के प्रति मतदाताओं का रुझान भी अहम रहेगा.
- शिवपुर विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण
शिवपुर सीट पर राजभर, यादव, पटेल-कुर्मी, मौर्य-कुशवाहा और दलित समुदायों के साथ मुस्लिम तथा सवर्ण मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है. यहां जातीय समीकरणों के साथ स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार का प्रभाव मुकाबले को दिशा दे सकते हैं.
बीजेपी के अनिल राजभर ने 2017 और 2022 में जीत हासिल की थी. 2022 में सुभासपा के अरविंद राजभर उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रहे. ऐसे में 2027 में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजभर मतदाताओं के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा किस दिशा में जाती है. दूसरे समुदायों का समर्थन किसे मिलता है.
- पिंडरा विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण
पिंडरा ग्रामीण क्षेत्र की महत्वपूर्ण विधानसभा सीट है। यहां पटेल-कुर्मी, भूमिहार, ब्राह्मण, यादव, दलित, राजभर और मौर्य-कुशवाहा समुदायों की भूमिका पर राजनीतिक दलों की नजर रहती है। मुस्लिम मतदाता भी कई इलाकों में चुनावी गणित को प्रभावित कर सकते हैं।
बीजेपी के डॉ. अवधेश सिंह ने 2017 और 2022 में जीत दर्ज की। कांग्रेस नेता अजय राय की राजनीतिक मौजूदगी के कारण भी इस सीट की चर्चा होती रही है। 2027 में उम्मीदवारों के चयन, ग्रामीण मुद्दों और विभिन्न सामाजिक समूहों के समर्थन से मुकाबले की दिशा तय हो सकती है।
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- अजगरा विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण
अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित अजगरा सीट पर दलित मतदाताओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है. इसके अलावा यादव, पटेल, राजभर, ब्राह्मण, मुस्लिम और मौर्य समुदायों का समर्थन भी चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकता है.
2017 में यह सीट सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के कैलाश नाथ सोनकर ने जीती थी. 2022 में बीजेपी के त्रिभुवन राम ने यहां जीत हासिल की. दोनों चुनावों के नतीजे बताते हैं कि इस सीट पर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं. 2027 में दलित मतदाताओं के रुझान के साथ दूसरे समुदायों का समर्थन भी निर्णायक हो सकता है.
- रोहनिया विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण
रोहनिया में पटेल-कुर्मी समुदाय को महत्वपूर्ण राजनीतिक समूह माना जाता है. इसके साथ भूमिहार, ब्राह्मण, दलित, यादव, राजभर और मौर्य-कुशवाहा मतदाताओं की भूमिका भी अहम हो सकती है.
2017 में बीजेपी के सुरेंद्र नारायण सिंह ने जीत दर्ज की थी, जबकि 2022 में अपना दल (एस) के डॉ. सुनील पटेल विजयी रहे. यह बदलाव गठबंधन की राजनीति और उम्मीदवारों के प्रभाव की अहमियत दिखाता है. 2027 में यहां बीजेपी और अपना दल (एस) के गठबंधन की रणनीति के साथ विपक्ष की तैयारी पर भी नजर रहेगी.
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- सेवापुरी विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण
सेवापुरी सीट पर पटेल-कुर्मी मतदाताओं के साथ भूमिहार, ब्राह्मण, दलित, यादव और राजभर समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. मुस्लिम मतदाता भी क्षेत्र के कुछ हिस्सों में चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं.
अपना दल (एस) के नील रतन सिंह पटेल ने 2017 और 2022 में जीत दर्ज की. ऐसे में 2027 में उनकी पार्टी के सामने अपना समर्थन बनाए रखने की चुनौती होगी. ग्रामीण विकास, सड़क, सिंचाई, रोजगार और स्थानीय समस्याएं भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं.
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2027 में किसका पलड़ा भारी रहेगा?
वाराणसी की आठों सीटों पर 2022 में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने जीत हासिल की थी. लेकिन 2027 में यही प्रदर्शन दोहराना एनडीए के लिए अपने आप तय नहीं माना जा सकता. शहर की सीटों पर शहरी सुविधाएं, कारोबार और स्थानीय विकास के मुद्दे अहम रहेंगे, जबकि ग्रामीण सीटों पर खेती, रोजगार, सड़क, सिंचाई और सामाजिक समीकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के सामने अपना मौजूदा जनाधार बनाए रखने की चुनौती होगी. वहीं विपक्ष की रणनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अलग-अलग सामाजिक समूहों को कितना प्रभावी ढंग से अपने साथ जोड़ पाता है.
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